“चिन्ह गए हुज़ूर”

 

आरसीवीपी प्रशासन अकादमी शाहपुरा लेक के स्वर्ण जयंती सभागार में संपन्न
हुआ नाटक का मंचन

नितिन तेजराज

9826925460

एशियन रिपोर्टर भोपाल राजधानी भोपाल में नाटक कला को संरक्षित कर
रही निरंतर नाट्य संस्था के द्वारा बुधवार शाम 7 बजे नवीन नाटक “चिन्ह गए हुज़ूर”
का मंचन किया गया ।
आरसीवीपी प्रशासन अकादमी शाहपुरा लेक के स्वर्ण
जयंती सभागार में नाटक का निर्देशन युवा निर्देशक नितिन तेजराज के द्वारा किया गया
। साहित्यकार मलय जैन द्वारा लिखित इस नाटक में लोकतंत्र के चार स्तंभ में से तीन
स्तंभों पर व्यंग्य किया गया है। इसमें शासन
, प्रशासन
एवं पत्रकारिता पर व्यंग के द्वारा कटाक्ष किया गया है।
वहीँ इस नाटक की विषय वस्तु व्यंग्यात्मक होने के कारण
नाटक के पात्रों के द्वारा नाटक में संवादों से हास्य उत्पन्न होता है।

नाटक में दरोगा
लोटन प्रसाद की प्रमुख भूमिका नितिन तेजराज ने निभाई, वहीँ मुंशी की भूमिका में अखिलेश
भार्गव, पत्रकार लवली सिंह की भूमिका में पूजा शर्मा, नेता अनोखी लाल की भूमिका
में लखन वर्मा, डाकू चट्टान सिंह की भूमिका में रूपेश श्रीवास्तव, सिपाही की
भूमिका में आयुष कुमार, सूचना कर्ता की भूमिका में रुद्रांश और लड़की की भूमिका
में कंचन गुर्जर नें अपनी अभिनय कला का प्रदर्शन किया ।

 इस मर्मस्पर्शी नाटक की कहानी थाने में दरोगा को एक
जंगल में एक व्यक्ति की हत्या की खबर मिलने से होती है।

   जब
दरोगा और मुंशी हत्या की तहकीकात करने जा रहे होते है
, तभी थाने में पत्रकार लवली सिंह और उसके बाद नेता अनोखी लाल आ जाते
है
, दोनों मिलकर दारोगा लोटन प्रसाद को परेशान करने लगते है, साथ में हत्या वाली जगह पर जाने के जिद करने लगते है, सभी लोग जंगल में हत्या वाली जगह पहुंच जाते है। दरोगा हत्या की
तहकीकात और गुत्थी सुलझाने की कोशिश करता है। मुंशी घटना स्थल बदलकर अपनी
जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करता है। पत्रकार अपने न्यूज़ चैनल के लिए चटपटी खबर
बनाता है और नेता उस लाश के ऊपर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने की कोशिश करता है।
सभी लोग अपने-अपने स्वार्थ को सिद्ध करने की कोशिश में लगे रहते हैं। इसी दौरान
जंगल में अंधेरा हो जाता है और सारे लोग मुसीबत में फंस जाते हैं। जंगल में ही रात
हो जाती है।

 

दरोगा
के द्वारा तय किया जाता है
, लाश यही रहेगी और बारी बारी से सब लोग लाश की रखवाली करेंगे। रात का घनघोर अंधेरा और जंगली जानवरों की आवाजों के बीच लाश उठ कर
खड़ी हो जाती है।
लाश उठ कर सबसे बारी बारी से बात करनें
का प्रयास करती है
, एक एक करके सब भूत भूत कहकर बेहोश हो जाते है। कहानी के अंत में लाश दारोगा से कहती है इन तीनों को जगाइए। मुंशी, नेता और पत्रकार तीनों को दरोगा जगाता है, सब फिर से डरे हुए है। तभी लाश कहती है, हम कोई भूत नहीं है। हम लोकतंत्र है। लाश जोर से कहती है लोकतंत्र को कोई मार नहीं सकता, कोई मार नहीं सकता, कोई मार नहीं सकता। ये था, है और रहेगा। तब
वहीँ
सब लोग मिलकर एक
साथ बोलते है
, चिन्ह गए हुज़ूर। और वर्तमान
व्यवस्थाओं पर कटाक्ष करता सस्पेंस और थ्रिल से परिपूर्ण यह नाटक समाप्त हो जाता
है।

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